जिंदगी भर भीड़ में रहते हुए
न जाने क्यों मैं अकेला खड़ा रह गया।
था दोस्त हर कोई
और निभाया रिश्ता मैंने भी हर कदम पर,
लेकिन न जाने क्यों मैं ही था
जो अपना दुश्मन बन गया।
कहता रहा हर किसी से
कि रुको मत बस आगे बढो,
पर न जाने क्यों मैं ही था
जो पीछे रह गया।
खीचीं हदें
हर रिश्ते ने चारो तरफ मेरे,
पर पता नही क्यों मैं ही था
जो इन हदों को पोंछता रह गया
बस इन हदों को पोंछता रह गया......
Sunday, August 30, 2009
Tuesday, August 25, 2009
Saturday, August 22, 2009
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