क्यों कुरेदते हो राख मेरी
ना मैं बचा न नामों-निशाँ मेरा
बस गुमनामी के अंधेरे मे
एक टूटता हुआ सितारा नज़र आता है.
Monday, September 21, 2009
Wednesday, September 9, 2009
मेरी दास्ताँ
पूर्व की उजली रौशनी से पश्चिम की ढलती लालिमा तक
मैं ही था
जो जीवन की ऊहापोह में उलझा रहा।
बन गया हर रिश्ता एक अनुबंध,
और वक्त की चक्की में हर एहसास
पल पल पिसता रहा।
छिन गए मायने जीने के
और मैं था
जो जीने को तरसता रहा
बस जीने को तरसता रहा..........
मैं ही था
जो जीवन की ऊहापोह में उलझा रहा।
बन गया हर रिश्ता एक अनुबंध,
और वक्त की चक्की में हर एहसास
पल पल पिसता रहा।
छिन गए मायने जीने के
और मैं था
जो जीने को तरसता रहा
बस जीने को तरसता रहा..........
Friday, September 4, 2009
Sunday, August 30, 2009
जिंदगी भर भीड़ में रहते हुए
न जाने क्यों मैं अकेला खड़ा रह गया।
था दोस्त हर कोई
और निभाया रिश्ता मैंने भी हर कदम पर,
लेकिन न जाने क्यों मैं ही था
जो अपना दुश्मन बन गया।
कहता रहा हर किसी से
कि रुको मत बस आगे बढो,
पर न जाने क्यों मैं ही था
जो पीछे रह गया।
खीचीं हदें
हर रिश्ते ने चारो तरफ मेरे,
पर पता नही क्यों मैं ही था
जो इन हदों को पोंछता रह गया
बस इन हदों को पोंछता रह गया......
न जाने क्यों मैं अकेला खड़ा रह गया।
था दोस्त हर कोई
और निभाया रिश्ता मैंने भी हर कदम पर,
लेकिन न जाने क्यों मैं ही था
जो अपना दुश्मन बन गया।
कहता रहा हर किसी से
कि रुको मत बस आगे बढो,
पर न जाने क्यों मैं ही था
जो पीछे रह गया।
खीचीं हदें
हर रिश्ते ने चारो तरफ मेरे,
पर पता नही क्यों मैं ही था
जो इन हदों को पोंछता रह गया
बस इन हदों को पोंछता रह गया......
Tuesday, August 25, 2009
Saturday, August 22, 2009
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