Monday, September 21, 2009

क्यों कुरेदते हो राख मेरी
ना मैं बचा न नामों-निशाँ मेरा
बस गुमनामी के अंधेरे मे
एक टूटता हुआ सितारा नज़र आता है.

Wednesday, September 9, 2009

था मैं परिंदा खुले आसमाँ का

थी उड़ान जिंदगी मेरी,

पर एक शाख के इश्क में अपने पर गवां बैठा।

अब झुलसता हूँ अपनी ही आहों में

कि,

ना है वो शाख और ना ही रही वो उड़ान

पर ज़ज्बा इतना है

कि इन दो आखों में आसमाँ लिए बैठा हूँ।

मेरी दास्ताँ

पूर्व की उजली रौशनी से पश्चिम की ढलती लालिमा तक
मैं ही था
जो जीवन की ऊहापोह में उलझा रहा।
बन गया हर रिश्ता एक अनुबंध,
और वक्त की चक्की में हर एहसास
पल पल पिसता रहा।
छिन गए मायने जीने के
और मैं था
जो जीने को तरसता रहा
बस जीने को तरसता रहा..........

Friday, September 4, 2009

अश्क क्या?
एक बूँद खारा पानी
या एक बूँद में खारा दरिया।

अश्क क्या?
बचपन में की खिलोने की जिद
या जिद्दी आशिक की तोडी हुई हर हद।

अश्क क्या?
बेटी को विदाई में मिला बाबुल का प्यार
या दूर जाते बेटे को माँ का दुलार।

अश्क क्या?
आखों से गालों पर ढलकती हुई आह
या किसी बिछुडे हुए को पाने की चाह।