था मैं परिंदा खुले आसमाँ का
थी उड़ान जिंदगी मेरी,
पर एक शाख के इश्क में अपने पर गवां बैठा।
अब झुलसता हूँ अपनी ही आहों में
कि,
ना है वो शाख और ना ही रही वो उड़ान
पर ज़ज्बा इतना है
कि इन दो आखों में आसमाँ लिए बैठा हूँ।
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