पूर्व की उजली रौशनी से पश्चिम की ढलती लालिमा तक
मैं ही था
जो जीवन की ऊहापोह में उलझा रहा।
बन गया हर रिश्ता एक अनुबंध,
और वक्त की चक्की में हर एहसास
पल पल पिसता रहा।
छिन गए मायने जीने के
और मैं था
जो जीने को तरसता रहा
बस जीने को तरसता रहा..........
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gajab sir ji,,,,tussi chha gaye.....
ReplyDeletesir ye poem ka use me kuch kar sakta hu........