Friday, August 21, 2009

काश! हम समझ पाते कि ये तड़प
क्यों है।
हँसी है होटों पर, लेकिन ये आखें नम क्यों हैं।
खड़े हैं चौराहे पर किसी बुत कि तरह,
पर ये सफर निरंतर क्यों है।
न जाने घुला क्या है आज इस फिजा में,
कि
डाल पर लगा हर फूल मुरझाया क्यों है

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