कदम उठते और गिरते रहे हर साँस के साथ हम निरंतर चलते रहे। भ्रम बस इतना ही था कि राह-ऐ-गर्द को ही हम मंजिल समझते रहे।
Saturday, August 22, 2009
मन् तेरे चाहने वाले तुझे क्या देंगे।
जब होगा तू रुखसत
इस एहसास-ऐ-जहाँ से
तेरे अपने ही तुझे जला देंगे।
और न रखेंगे तेरे जिस्म की खाक को
पास अपने,
उसे भी किसी दरिया में बहा देंगे।
Friday, August 21, 2009
काश! हम समझ पाते कि ये तड़प क्यों है। हँसी है होटों पर, लेकिन ये आखें नम क्यों हैं। खड़े हैं चौराहे पर किसी बुत कि तरह, पर ये सफर निरंतर क्यों है। न जाने घुला क्या है आज इस फिजा में, कि डाल पर लगा हर फूल मुरझाया क्यों है